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संसद में जारी गतिरोध पर राष्ट्रपति नाराज़, साधा विपक्ष पर निसाना कहा आप बहुमत की आवाज दबा रहे हैं

नई दिल्ली। संसद में जारी गतिरोध के मुद्दे पर विपक्ष को आड़े हाथ लेते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने गुरुवार (8 दिसंबर) को कहा कि सदन धरना-प्रदर्शन और ऐसी बाधा पैदा करने की जगह नहीं है जिसमें अल्पमत द्वारा बहुमत की आवाज दबा दी जाए। प्रणव ने सांसदों को बताया कि विपक्ष का काम सदन को बाधित करना नहीं, बल्कि चर्चा और कामकाज करना है। रक्षा संपदा दिवस व्याख्यान के अवसर पर यहां मजबूत लोकतंत्र के लिए चुनाव सुधार विषय पर अपने संबोधन में प्रणव ने कहा-संसदीय प्रणाली में कामकाज में बाधा डालना पूरी तरह अस्वीकार्य है। लोग अपने प्रतिनिधियों को बोलने के लिए भेजते हैं, धरना पर बैठने के लिए नहीं, और न ही सदन में दिक्कतें पैदा करने के लिए। राष्ट्रपति बनने से पहले कद्दावर सांसद रह चुके प्रणव ने कहा कि बाधा पैदा करने का मतलब है कि आप चोट पहुंचा रहे हैं, आप बहुमत की आवाज दबा रहे हैं। सिर्फ अल्पमत ही सदन के बीचोंबीच आता है, नारेबाजी करता है, कार्यवाहियां रोकता है और ऐसे हालात पैदा करता है कि अध्यक्ष के पास सदन की कार्यवाही स्थगित करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। प्रणव ने ऐसे समय में यह तीखी टिप्पणियां की हैं जब पिछले 15 दिनों से नोटबंदी के मुद्दे पर संसद में गतिरोध जारी है। राष्ट्रपति ने कहा कि पूरे साल में महज चंद हफ्ते ही संसद का सत्र आयोजित होता है। नोटबंदी के लिए आप कोई और जगह चुन सकते हैं। लेकिन भगवान के लिए, अपना काम करें। आपको कामकाज करना होता है। आपको सदस्यों के अधिकारों का इस्तेमाल करने, खासकर लोकसभा सदस्यों को धन और वित्त के मुद्दे पर कामकाज में अपना वक्त देना होता है।
प्रणव ने साफ किया कि वह किसी खास पार्टी या व्यक्ति पर निशाना नहीं साध रहे, क्योंकि यह सबकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा-तथ्य है कि यह (बाधा) आम बात हो गई है, जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। चाहे कितने भी मतभेद हों, हमारे पास अपनी बात खुलकर कहने का मौका होता है। कोई भी अदालत सदन में कही गई बातों में दखल नहीं दे सकती। यदि कोई सदस्य किसी पर आरोप लगाता भी है, तो कोई अदालत उस पर मुकदमा नहीं चला सकती, क्योंकि उसने ऐसा सदन में कहा है। बाधाएं पैदा कर इस तरह की आजादी का गलत इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। प्रणव ने कहा कि किसी लोकतंत्र में तीन डी यानी डिबेट (वाद-विवाद), डिसेंशन (असहमति) और डिसीजन (निर्णय) अहम होते हैं। लेकिन इसमें चौथा डी नहीं होता। कम से कम मेरे शिक्षक ने मुझे नहीं बताया कि एक चौथा डी डिसरप्शन (बाधा) भी होता है। राष्ट्रपति ने कहा कि जब भारत का बजट छोटा होता था और जब पंचवर्षीय योजना के लिए आवंटित की जाने वाली राशि मामूली होती थी, तो संसद का दो-तिहाई वक्त धन एवं वित्त पर चर्चा में गुजरता था। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए होता था क्योंकि लोकसभा में जनप्रतिनिधियों का अधिकार है कि उनकी मंजूरी के बगैर कोई कर नहीं लगाया जा सकता और न ही उनकी मंजूरी के बगैर भारत की संचित निधि से कोई पैसा निकाला जा सकता। संसद की मंजूरी के बगैर भारत की संचित निधि से कोई रकम खर्च नहीं की जा सकती । लेकिन इन मुद्दों पर यदि बहस नहीं हो, जब आप हर साल 16 लाख करोड़ से 18 लाख करोड़ प्रति वर्ष खर्च करें, यदि सदन के पटल पर इन चीजों पर बारीकी से चर्चा न हो तो मैं नहीं समझता कि हमारी संसदीय प्रणाली बहुत प्रभावी तरीके से काम करेगी और सफलतापूर्वक आगे बढ़ेगी।
महिला आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्रपति ने कहा कि 2014 के चुनाव ने दिखाया कि जब महिलाओं को टिकट देने की बात आती है तो कोई पार्टी उदार नहीं होती। उन्होंने कहा कि लोकसभा की सीटों में कुछ आरक्षण होना चाहिए और राज्यसभा पहले ही महिला आरक्षण विधेयक पारित कर चुकी है। प्रणव ने कहा कि सरकार को लोकसभा में बहुमत प्राप्त है और इस सदन को भी विधेयक पारित कर देना चाहिए। चुनाव सुधार के मुद्दे पर राष्ट्रपति ने कहा कि चुनाव आयोग ने चुनाव सुधार के लिए अपनी सिफारिशों से लैस अहम दस्तावेज बांटे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि हमें इसे गंभीरता से लेकर सार्वजनिक तौर पर बहस करनी चाहिए। इसके बाद यदि जरूरत पड़े तो कुछ चुनाव सुधारों के लिए संशोधन एवं शुद्धियां की जा सकती हैं। उन्होंने एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे का भी जिक्र किया और इसे बहुत विवादित विषय करार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि इसे मौजूदा संविधान की रूपरेखा के दायरे में हासिल करना बेहद मुश्किल है। प्रणव ने कहा कि कई लोगों को मालूम है कि बार-बार होने वाले चुनावों पर काफी खर्च होते हैं जिससे प्रशासनिक एवं वित्तीय संसाधनों पर दबाव पड़ता है। लेकिन हम लोकतंत्र की खातिर यह कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं, पर हमारे जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में विकास की कीमत पर यह नहीं होना चाहिए। लिहाजा, हमें यह सुनिश्चित करने का रास्ता तलाशना चाहिए कि यदि संभव हो तो संसद और विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ कराए जाएं।

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